नयी कहानी होने के बाद भी आधुनिक आवरण से ओतप्रोत, लेकिन छत्तीसगढ़ी कला,संस्कृति व परिवेश से कोसो दूर यादव जी के मधु जी
यादव जी के मधु जी…बाहरी आवरण तो अच्छा है पर अंदर में आत्मा ही नही है।
SANJHA BIHANIYA… प्रभात सिनेमा रायपुर सहित छत्तीसगढ़ के विभिन्न सिनेमाघरों में लेखक-निर्देशक आदिल खान की फ़िल्म यादव जी के मधु जी प्रदर्शित हुई।
जिस तरह से फ़िल्म को प्रचारित किया जा रहा था कि ये फ़िल्म एक नये मनोरंजक नज़रिए से फुल बकर टाइप की है तो हम निसन्देह ये कह सकते हैं कि ये फ़िल्म फुल बकर तो ज़रूर है पर मनोरंजक बिल्कुल भी नही है। इसमें अन्य फिल्मो की तरह लव और रोमांस भी है पर वो हीरो व हेरोइन के बीच नही बल्कि एक अधेड़ उम्र के चरित्र अभिनेता व अभिनेत्री के बीच है जो कहानी में एक नयापन तो ज़रूर देता है पर कमज़ोर प्रस्तुतिकरण के कारण वो मज़ा भी नीरस हो जाता है।
तकनीकी तौर पर यदि देखा जाए तो इस फ़िल्म में हिंदी सिनेमाई ट्रीटमेंट तो अच्छा है पर इसमें भी छत्तीसगढियापन का नदारद होना शायद यहाँ के दर्शकों को रास न आये।
सभी कलाकारों ने अपनी योग्यता के अनुरूप अच्छा काम किया है। गीत-संगीत भी कुछ खास नही है और छत्तीसगढ़ी तो बिल्कुल भी नही,हां अपने समय के सुपर हिट एक गीत “चना के दार राजा” को नये कलेवर में प्रस्तुत करने की अच्छी कोशिश की गई है पर ऐसा लगता है जैसे उसमें भी मूल कृति के साथ अन्याय हो गया है।
संवाद बेहद कमजोर है जिसमे ज़्यादातर हिंदी भाषा का उपयोग किया गया है,छत्तीसगढ़ी तो बस नाम मात्र की है वो भी अपरिपक्व और दिशाहीन। फ़िल्म का सम्पादन भी ढीला है जो दर्शकों को उबासी लेने पर मजबूर कर देता है।
कुल मिला यदि ये कहा जाये कि यादव जी के मधु जी नयी कहानी होने के बाद भी आधुनिक आवरण से ओतप्रोत लेकिन छत्तीसगढ़ी कला,संस्कृति व परिवेश से कोसो दूर है तो कोई ग़लत बात नही होगी।अब दर्शक अपनी प्रतिक्रिया क्या देती है ये तो वो जब फ़िल्म देखेंगे तभी पता चलेगा पर फिलहाल जो जानकारी मिली है उसके हिसाब से सिनेमाघरों में भी दर्शक नदारद है।

