किस सदी की कहानी है दंतेला की, जहां पानी को लेकर दिखाया गया है हाहाकार, कालदोष सबसे बड़ी कमी के रूप में उभरा
SANJHA BIHANIYA… शुक्रवार को रिलीज हुई छत्तीसगढ़ी फिल्म दंतेला की कहानी चरचरी गांव और पानी के इर्द गिर्द घूमती है, जिसमें हॉरर का तड़का भी दिया गया है। लेकिन यह चरचरी गांव छत्तीसगढ़ का तो हो नहीं सकता जहां सरकार ना पहुंच सकती हो और विकास न कर सकी हो।
बहरहाल यह फिल्म हीरो, विलेन और नायिका इन तीनों को ही केंद्र में रहकर आगे बढ़ती है। परसाराम नामक वलेन खुद गांव के कुएं के पानी का राजा बना बैठा है और गांव वालों को पानी भरने के लिए सिर्फ 15 मिनट का समय देता है।
नायक और नायिका जब इसका विरोध करते हैं तभी फिल्म की असली कहानी शुरू होती है जो मध्यांतर के बाद है। फिल्म में सस्पेंस और थ्रिल का भी तड़का है, जो कहीं-कहीं पर बेअसर भी दिखाई दिया।
बतौर निर्देशक डॉक्टर शांतनु पाटनवार की यह पहली फिल्म है, निर्देशन अच्छा है, कैमरा एंगल, बैकग्राउंड म्यूजिक और कहानी को प्रेजेंट करने का तरीका भी सराहनीय है लेकिन फिल्म की लंबाई खटकती है जिसे काटा जा सकता था।
फिल्म का संगीत भी ठीक-ठाक है, आर्टिस्ट की एंट्री पर बजने वाला बैकग्राउंड म्यूजिक लोगों को पसंद आया। फिल्म की नायिका के इंट्रोडक्शन में उसे जो तकिया कलाम दिया गया था “हां नई तो” अच्छा था उसे कंटीन्यू करने की जरूरत थी लेकिन उसे दरकिनार कर दिया गया।
फिल्म में कालदोष की बात करें तो यह सबसे बड़ी कमजोरी है एक तरफ आप दिखा रहे हैं की आज भी गांव के लोग कंडील के भरोसे हैं और एक तरफ कलाकार पुष्पा की मिमिक्री कर रहे हैं। पुष्पा 2025 की फिल्म है और कंडील वाला जमाना कुछ और था। बाद में फिल्म में बिजली भी दिखाई देती है।
बहरहाल फिल्म एक प्रयोगात्मक तौर पर जरूर बनाई गई है लेकिन दर्शक सिनेमाघर प्रयोग देखने नहीं मनोरंजन के लिए जाता है, इसलिए निर्माता निर्देशकों को दर्शकों के मनोरंजन का ख्याल रखना बहुत जरूरी है।
ऐसे छत्तीसगढ़ी फिल्मों में रुचि रखने वालों के लिए यह फिल्म एक बार देखने लायक है।

