ताबीर ने की टिप्पणी कहा लाउड फ़िल्म है घर-परिवार
SANJHA BIHANIYA RAIPUR…छत्तीसगढ़ी फिल्मी इतिहास में जब भी लाउड ( बैकग्राउंड) फिल्मों का जिक्र होगा तो घर-परिवार टॉप 10 में होगी। कभी-कभी तो बीजीएम इतना हावी लगता है कि संवाद ही समझ नहीं आते। शुक्रवार को रिलीज हुई घर-परिवार कोई जादू नहीं जगा पाई।
कहानी
कहानी ऐसे परिवार की है जिसमें नायक किशन (जीत शर्मा) को चाचा-चाची राधेश्याम-ममता ( धर्मेंद्र चौबे-अनुराधा दुबे) ने उसे पाला और बड़ा किया। वहां नायक की बुआ कुसुम (उपासना वैष्णव) फूफा (ललित उपाध्याय) के अलावा एक चचेरा भाई भी है। भाई को जुए की लत लग जाती है जबकि किशन को राधा (मुस्कान) से प्यार हो जाता है। हालांकि राधा किशन से प्यार नहीं कर रही होती है लेकिन किशन की सच्चाई जानकर वह भी चाहने लगती है।इधर किशन की शादी के लिए रिश्ता देखकर तैयारियां हो रही होती है और किशन और राधा दम्पती के तौर पर घर लौटते हैं। शादी से नाखुश चाचा उसे घर से निकाल देता है। दम्पती दूसरे शहर जाकर खाने-कमाने लगते हैं। एक बच्चा भी होता है। दिल में छेद होने के कारण इलाज के लिए 3 लाख की जरूरत होती है। किशन चाचा से मदद मांगता है। वे तैयार भी होते हैं लेकिन बुआ और फूफा के विरोध के चलते पैसे नहीं मिलते और बच्चे की मौत हो जाती है। कहानी आगे बढ़ती है। ईमानदारी से प्रभावित होकर एक बड़ा कारोबारी उसे नौकरी दे देता है। इस बीच किशन को उसकी बहन से पता चलता है कि चाचा का परिवार गुरबत की जिंदगी जी रहा है। जुएं की लत में भाई धर्मेंद्र का अंगूठा लगवाकर घर बेच देता है। क्या किशन गांव जाकर मदद करता है? राधा को चाचा-चाची अपनाते हैं? इन सवालों के जवाब फ़िल्म में मिल जाएंगे।
डायलॉग
संवाद ऐसे नहीं हैं जो थिएटर में तालियों की अपील करते हों। हालांकि एक संवाद है जिस पर मनन किया जा सकता है- एमन ल दारु पियादो। और दुनिया के कोई भी काम करा दो। हमर छत्तीसगढ़ इही म बदनाम हवय
एक्टिंग
जीत शर्मा ने बतौर लीड डेब्यू किया है। अभिनय ठीकठाक है। उनमें अभी स्पार्क की जरूरत है। मुस्कान वैसी ही नजर आईं हैं जैसी अन्य फिल्मों में। अगर वे आगे भी इसी तरह के रोल में रहीं तो धीरे से साइड एक्ट्रेस का रोल ऑफर होने लगेगा। छालीवुड को नया कॉमेडियन अरुण भांगे मिल सकता था लेकिन उन्हें खुद को साबित करने का उतना मौका नहीं दिया गया। वे थियेटर की उपज हैं इसलिए अभिनय में वह नजर आया। उपासना वैष्णव, अनुराधा दुबे, ललित उपाध्याय और धर्मेंद्र चौबे अनुभवी कलाकार हैं। उनके काम में वह तजुर्बा नजर आता है।
गीत-संगीत
देखने-सुनने में गीत अच्छे लगते हैं लेकिन सिर्फ थिएटर तक। घर तक पहुंचने के बाद शायद ही आप गुनगुनाएं। फ़िल्म लाउड होने की वजह से गीत के बोल साफ तौर पर समझ नहीं आते लेकिन सुनील सोनी ने कर्णप्रिय बनाने की पूरी कोशिश की है।
क्या है कमी
एंटरटेनमेंट में या तो मसाला चाहिए या तड़का। कमर्शियल सिनेमा की यह सबसे बड़ी जरूरत है। अभिनेत्री मुस्कान की छवि गांव की भोली लड़की की बन चुकी है। उनसे लटके-झटके की उम्मीद अब दर्शक भी नहीं कर रहे। जीत में अभी वो चार्म नहीं है कि फ़िल्म का पूरा भार उस पर लादा जा सके। कहीं-कहीं फिल्म बोझिल सी लगती है। हालांकि कहानी बढ़िया है जिसे रन बटोरु पिच बनाया जा सकता था। सिनेमेटोग्राफी ठीक-ठाक है। ड्रोन सीन भी अच्छे हैं।
कैसी है फ़िल्म- एवरेज से कम
नम्बर- 2/5

