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जगन्नाथ शब्द का अर्थ ‘जगत के स्वामी’ होता है, पुरी नगर ‘जगन्नाथपुरी’ कहलाती है, जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव का हिन्दू धर्म में बहुत महात्म्य व महत्व है।

SANJHA BIHANIYA…द्वापर काल से जगन्नाथ यात्रा का आयोजन तब से किया जाता है जब भगवान श्रीकृष्ण जी की बहन सुभद्रा जी ने उनसे नगर भ्रमण की इच्छा जाहिर की। उनकी इच्छानुसार नगर भ्रमण के लिए रथयात्रा का आयोजन किया गया। इस यात्रा के लिए तीन रथ बनाए गए और इन अलग अलग रथों पर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने बहन सुभद्रा को नगर भ्रमण कराया था। कालांतर से रथयात्रा की यह परंपरा चलती आ रही है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अब रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर से निकालकर प्रसिद्ध गुंडिचा माता के मन्दिर तक जाती है। जहां पर भगवान जगन्‍नाथ जी सात दिनों तक विश्राम करते हैं तत्पश्चात सभी जगन्नाथ जी मंदिर वापस आ जाते हैं।

प्रभु जगन्नाथ जी यात्रा महोत्सव जगत कल्याण के लिए है। मान्यता है कि इस रथयात्रा में सम्मलित होने का पुण्य 100 यज्ञों के बराबर होता है। इन समय उपासना के दौरान अगर कुछ उपाय किये जाएं तो श्री जगन्नाथ अपने भक्तों की समस्या को जड़ से खत्म कर देते हैं। इस रथ यात्रा में शामिल होने से व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं। मान्यता तो ये भी है कि जो व्यक्ति इस रथ यात्रा में भाग लेता है वह जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।

इस त्योहार को ‘घोसा यात्रा’, ‘दशवतार यात्रा’, ‘नवादिना यात्रा’ या ‘गुंडिचा यात्रा’ के नाम से भी जाना जाता है।

रथयात्रा में सबसे आगे श्री बलराम जी का रथ, बीच में देवी सुभद्रा जी का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण जी का रथ होता है। तीनों के रथ को खींचकर मौसी के घर यानी कि गुंडीचा मंदिर लाया जाता है जो कि जगन्नाथ मंदिर से करीब तीन किलोमीटर दूर है।

आधुनिक समय में तीन लकड़ी के रथ बनाए जाते हैं जिसे श्रद्धालु अपने हाथों से खींचते हैं।

♦️भगवान जगन्नाथ जी के रथ को ‘नंदीघोष’ या ‘गरुड़ध्वज’ कहते हैं। इसका रंग लाल और पीला होता है। यह रथ विशाल होता है, जिसमें 16 पहिए लगे होते हैं।

♦️बलराम जी के रथ को ‘तालध्वज’ कहते हैं, जिसका रंग लाल और हरा होता है। बलराम के रथ में 14 पहिये लगे होते हैं।

♦️देवी सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’ या ‘पद्म रथ’ कहा जाता है, जो काले या नीले और लाल रंग का होता है। सुभद्रा जी के रथ में 12 पहिए लगे होते हैं।

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