सनिमा

फिल्म समीक्षक ताबीर ने की समीक्षा, लिखा मैं वादा निभाहूँ उम्मीदों पर नहीं उतरी खरा

अपनों संग किए वादे को पूरा करती ‘मैं वादा निभाहूँ… उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई

ताबीर हुसैन ( समीक्षा बतौर दर्शक)

SANJHA BIHANIYA RAIPUR…याकूब खान निर्देशित ‘ मैं वादा निभाहूँ’ उन तमाम फिल्मों में शुमार है जो आई गई साबित हुईं। हालांकि छत्तीसगढ़ी इंडस्ट्री में साफ-सुथरी फिल्मों की फेहरिस्त में यह फ़िल्म भी शामिल है लेकिन बिना मसाले के एंटरटेनमेंट भला कैसे हो।

स्टार कास्ट/अभिनय

फ़िल्म के डायरेक्टर याकूब जो विलेन (बजरंगी) भी हैं। हंसाते नजर आते हैं। स्टार कास्ट करते वक्त शायद पैसे बचाने का ख्याल किया गया है। एक-दो चेहरे को छोड़ सारे नए कलाकार हैं। संदीप त्रिपाठी पर बड़ा दांव खेला गया। राजू त्रिपाठी हर बार की तरह जंचे हैं। अभिनेत्रियों ने अभिनय को निखारने में कमी तो नहीं कि लेकिन पर्दे के नए खिलाड़ी हैं, साफ झलकता है। कहीं-कहीं बेवजह हास्य ठूंसने की कोशिश की गई है।

 

कहानी

हीरो-हीरोइन छोटेपन से एक-दूसरे से प्यार करते हैं। हालात ऐसे बनते हैं कि दोनों अलग हो जाते हैं। नाटकीय घटनाक्रम में बड़े होने पर मुलाकात होती है और बचपन का प्यार अंगड़ाई लेने लगता है। कई मोड़ आते हैं। अंत भला तो सब भला की तर्ज पर हैप्पी एंडिंग होती है। जैसा कि फ़िल्म का नाम है मैं वादा निभाहूँ। भाई अपने बहन से किया वादा उसके सुहाग की रक्षा कर पूरा करता है। प्रेमी अपनी प्रेमिका को अपना बनाकर वादा पूरा करता है और एक बिगड़ैल अपनी मां से वादा कर सुधर जाता है। फ़िल्म बचपने से शुरू होती है।

डायरेक्शन

छालीवुड में फिल्में डायरेक्टर के नाम से भी बिकती हैं। ऐसे में याकूब नए चेहरे हैं। फ़िल्म में सबसे नेचुरल अदाकारी उन्हीं की नजर आई लेकिन संयोगवश वे डायरेक्टर भी हैं। फिल्मों में डायरेक्टर ही सर्वे सर्वा हो तो पर्दे पर सफलता के मौके बेहतर होते हैं। नई पारी के मुताबिक याकूब खान का निर्देशन ठीक है लेकिन काफी कसावट की जरूरत है।

गीत- संगीत

लगभग सवा दो घण्टे की फ़िल्म में पहला गीत राखी के बंधन ल निभाबे कर्णप्रिय है। इसके बाद हो गेहे मोला प्यार रे, मैं वादा निभाहूँ भी ठीकठाक हैं। गानों में कोई भी ऐसा नहीं है जो लोगों की जुबान पर राज करे न ही शादी-ब्याह के मौके पर बजाया जाए। लेकिन सुनने में अच्छे जरूर हैं।

डायलॉग

इसमें कोई शक नहीं कि संवाद भारी-भरकम हैं। इसके मुकाबले चेहरे छोटे पड़ गए। थिएटर में किसी भी डायलॉग पर तालियां नहीं बजी लेकिन डायलॉग राइटर ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है।

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