एक्शन के चक्कर में मूल कहानी से भटकी फिल्म गुईयां 2, कमजोर प्रस्तुतिकरण ने किया निराश
SANJHA BIHANIYA… बहुप्रतीक्षित छत्तीसगढ़ी फ़िल्म “गुईंया 2” श्याम सिनेमा रायपुर सहित छत्तीगसढ़ के विभिन्न सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई।
जैसा कि पहले भाग “गुईंया 1” में अमलेश नागेश मुख्य भूमिका में थे वंही इसके दूसरे भाग में अमलेश से कहीं ज्यादा दिलेश साहू को फ़िल्म के मुख्य किरदार की तरह पेश किया गया है जो बहुत ही ज्यादा प्रभावी दिखता है। अब अमलेश जो फ़िल्म के निर्देशन में भी है उनकी इच्छा थी या कहानी की डिमांड, ये तो वही भली भांति बता सकते हैं पर शायद दर्शकों को ये बात रास न आये।
खैर,फ़िल्म की कहानी बहुत ही साधारण सी बदले (reveng) व गांव में नशे की समस्याओं पर केंद्रित है पर उसमें में भी झोलझाल है, एक्शन को प्राथमिकता देने के चक्कर मे शायद कहानी अपनी दिशा से भटकती नज़र आती है।
पूरी फिल्म में सिवाए एक्शन के कुछ भी नज़र नही आता। न कलाकरो का अभिनय, न कहानी और न ही कहानी में किसी भी तरह की कोई पकड़, सम्पादन बहुत ही कमज़ोर है जो एक एक्शन प्रधान फ़िल्म की गति के हिसाब के बहुत ही धीमा है।
प्रकाश अवस्थी, जीत शर्मा,अनिकृति चौहान वैसे तो प्रमुख किरदार है पर वो भी सिर्फ अतिथि कलाकार के भूमिका की तरह ही नज़र आते हैं।
गीत-संगीत की अगर बात करें तो पहले भाग “गुईंया” का चर्चित गाना “काने के बाली” के अलावा किसी भी गाने ने अपनी उपयोगिता नही दिखाई है,जो बहुत ही निराशाजनक है।
फिल्म की सिनेमाटोग्राफी अच्छी है पर निर्देशन व प्रस्तुतिकरण कमज़ोर है। न कोई गति न ही कोई दिशा…
वैसे इस फ़िल्म में छत्तीसगढियापन की भी कमी है पर अचानक कुछ सिचुएशन में थोड़ा अपनापन ज़रूर लगता है पर वो सिर्फ एक क्षेत्र विशेष का प्रतीत होता और दिशाहीनता के कारण शायद वो भी दर्शकों को पसंद न आये।
खैर, अब दर्शकों की पसंद या नापसन्द को तो बड़े से बड़ा जानकर भी नही जान सकता है। यदि दर्शक (ईश्वर) की कृपा रही तो फ़िल्म अच्छी है और नही तो कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो सब ज़ीरो बटा सन्नाटा है।
दर्शक के विचारों पर आधारित लेख…

